مقال عن نظرية الأجور | الهندية | العمال | اقتصاديات

فيما يلي مقال عن "نظرية الأجور" للصف التاسع والعاشر والحادي عشر والثاني عشر. اعثر على الفقرات والمقالات الطويلة والقصيرة حول "نظرية الأجور" المكتوبة خاصة لطلاب المدارس والكليات باللغة الهندية.

مقال عن نظرية الأجور


محتويات المقال:

  1. सिद्धान्त कोष सिद्धान्त (نظرية صندوق الأجور)
  2. Sub का जीवन-निर्वाह सिद्धान्त (نظرية الكفاف للأجور)
  3. Standard का जीवन-स्तर सिद्धान्त (مستوى المعيشة نظرية الأجور)
  4. सिद्धान्त अधिकारी सिद्धान्त (نظرية المطالب المتبقية)
  5. ivity का सीमान्त उत्पादकता का सिद्धान्त (نظرية الإنتاجية الحدية للأجور)
  6. Modern का आधुनिक सिद्धान्त (نظرية الأجور الحديثة)


مقالة # 1. सिद्धान्त कोष सिद्धान्त ( نظرية صندوق الأجور):

इस सिद्धान्त का प्रतिपादन अर्थशास्त्र के जनक प्रो. एडम स्मिथ ने किया ، परन्तु इसे सही रूप में प्रस्तुत करने का श्रेय जे. एस. J (JS Mill) को जाता है। प्रो. मिल के अनुसार मजदूरी श्रम की पूर्ति व की माँग माँग की सापेक्षिक दशाओं पर निर्भर करती है।

मजदूरी जनसंख्या व पूँजी के अनुपात पर है अर्थात् श्रमिक वर्ग वह वह संख्या मजदूरी मजदूरी पर पर काम काम काम तैयार है है है है है है है है है है है है है है है है है है है है से से से से से रखा रखा रखा रखा रखा रखा रखा रखा रखा रखा रखा W Fund कहलाती मात्रा जो मजदूरी की सेवाओं खरीदने के के लिए रखी जाती जाती कोष कोष W (صندوق الأجور) कहलाती है।

W निश्चित भी के लिए यह मजदूरी कोष (صندوق الأجور) भी निश्चित होता है। मजदूरी कोष निश्चित होने के कारण मजदूरी दर श्रमिकों की संख्या पर निर्भर करती है।। श्रमिकों की संख्या अर्थात् पूर्ति बढ़ने पर रूप से मजदूरी दर कम होगी और श्रमिकों श्रमिकों संख्या कम कम कम कम कम पर पर मजदूरी मजदूरी होगी।।

प्रो. है ने इसे निम्न सूत्र द्वारा प्रदर्शित किया है:

यह बात उल्लेखनीय है कि प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री अर्थव्यवस्था पूर्ण रोजगार रोजगार की एक आधारभूत मान्यता लेकर चले हैं। उनका कहना है कि अर्थव्यवस्था में पूर्ण रोजगार सामान्य स्थिति स्थिति के रूप में विद्यमान रहता है।

कारण कारण Y (राष्ट्रीय आय) निश्चित होता है और अर्थात् अर्थात् आय का वह जो श्रम सेवाओं सेवाओं लिए लिए भुगतान की की से जाता जाता जाता जाता जाता जाता जाता जाता है है है जाता है।।।। यदि हम पूर्ण रोजगार की स्थिति को स्थिति न मानें तो इस सिद्धान्त के अनुसार अनुसार दर में में में में में करने करने के के हैं।।

जो निम्नलिखित हैं:

(i) राष्ट्रीय आय में वृद्धि की जाए जिससे मजदूरी कोष में वृद्धि हो।

(ii) मजदूरों की संख्या में कमी की जाए।

इस सिद्धान्त में हम यह मानकर चलते कि श्रम संगठनों द्वारा मजदूरी परिवर्तन परिवर्तन नहीं जा सकता सकता मजदूरी मजदूरी के के के रूप जाने जाने जाने वाली जाने वाली वाली वाली वाली वाली वाली वाली वाली वाली वाली वाली वाली वाली वाली।।

आलोचना ( النقد):

प्रो सिद्धान्त भी प्रमुख रूप से निम्न कमियों से घिरा हुआ है जिन्हें प्रो. वाकर ، थोर्टन आदि विद्वानों द्वारा प्रकाश में लाया गया है:

أنا. I-कुशलता की उपेक्षा (يتجاهل الكفاءة):

इस सिद्धान्त में श्रम की कार्यकुशलता की उपेक्षा की गयी है। सम्भवतः यह मान लिया गया है कि श्रमिकों की कार्यकुशलता एक जैसी है और इसी इसी मजदूरी पर पर पर पर के प्रभाव प्रभाव को को है है।।।

ثانيا. W एवं रोजगार (الأجور والعمالة):

Key सिद्धान्त के अनुसार यदि श्रमिक अपनी नकद मजदूरी कटौती कटौती कर कर ले तो रोजगार हो हो जायेगी जायेगी जायेगी Key (Keynes) Key अनुसार मजदूरी मजदूरी मजदूरी केवल लागत लागत बल्कि माँग।।।।।। मजदूरी कटौती का परिणाम यह होता है जहाँ एक ओर लागत कम होती है वहाँ वहाँ ओर अर्थव्यवस्था अर्थव्यवस्था अर्थव्यवस्था अर्थव्यवस्था अर्थव्यवस्था माँग माँग कम कम है।। इससे बेरोजगारी बढ़ती है।

ثالثا. W कोष (صندوق الأجور):

मजदूरी कोष का निर्माण किस प्रकार होता है इस सिद्धान्त से स्पष्ट नहीं होता।। केवल यह मान लिया गया है कि श्रमिकों को उनकी सेवा के बदले भुगतान करने करने लिए लिए एक एक एक मजदूरी कोष कोष का का लेते हैं हैं हैं؛ इस सिद्धान्त से यह बिल्कुल पता नहीं लगता मजदूरी कोष कोष कौन कौन सी पूँजी पूँजी शामिल है।।

د. I संघों की उपेक्षा (يتجاهل النقابات العمالية):

इस सिद्धान्त में भी श्रम संघों की भूमिका को छोड़ दिया गया है। हैं में मजदूरी के निर्धारण में श्रम संघ युग में में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं परन्तु परन्तु इस सिद्धान्त सिद्धान्त में इस भूमिका भूमिका स्वीकार किया है है।।

v. श्रम की परोक्ष माँग (الطلب المشتق على العمل):

उत्पादन में सभी साधनों की माँग प्रत्यक्ष होकर परोक्ष होती है पहले वस्तु वस्तु की होती है है है वस्तु की की की माँग माँग बाद साधन साधन साधन की की की की की की की की की।।। इसका मजदूरी कोष से कोई सम्बन्ध नहीं है। यह सिद्धान्त वास्तव में यह मानकर चला है श्रम की की माँग मजदूरी कोष पर निर्भर करती है।


مقالة # 2. मजदूरी का जीवन-निर्वाह सिद्धान्त ( نظرية الكفاف للأجور):

फ्रांस के अर्थशास्त्रियों ने मजदूरी निर्धारण के सिद्धान्त को प्रतिपादित किया इसी कारण मजदूरी का का सिद्धान्त सिद्धान्त सबसे सबसे सबसे पुराना सिद्धान्त है।। परम्परावादी अर्थशास्त्रियों एडम स्मिथ ، माल्थस ، रिकार्डो आदि ने इस सिद्धान्त का समर्थन किया है। Less अर्थशास्त्री लेसले (Lessele) सिद्धान्त इसे मजदूरी का लौह सिद्धान्त (قانون الأجور الحديدية) कहा है।

Ass की मान्यताएँ ( افتراضات النظرية):

है का जीवन-निर्वाह सिद्धान्त दो मान्यताओं पर आधारित है:

(ط) जनसंख्या का तेजी से बढ़ना

(ii) क्रमागत उत्पत्ति ह्रास नियम।

नियम की व्याख्या ( شرح النظرية):

जिस प्रकार पूर्ण प्रतियोगिता में दीर्घकाल में वस्तु कीमत कीमत उसका उत्पादन लागत के होने की की पायी पायी जाती जाती है में में में में में में में में में में में में में में में में में में में में में होने होने होने होने होने होने होने होने होने बराबर।।। श्रम की उत्पादन लागत वह न्यूनतम मजदूरी है श्रमिक अपने जीवन निर्वाह निर्वाह की सभी आवश्यक आवश्यक एवं एवं सेवाएँ सेवाएँ ले ले।।

s हमने कि जीवन-निर्वाह की दृष्टि से श्रमिकों को s s Rs. 10 आवश्यक है अर्थात् روبية. 10 में उसके जीवन की मौलिक आवश्यकताएँ यदि पूरी हों तो उसकी मजदूरी मजदूरी दर सम्पूर्ण बाजार में में में s s s s s 10 ही प्रचलित होगी। s को किन्हीं कारणों s روبية. 10 से अधिक मजदूरी प्राप्त होती है तो विवाह करते हैं और उनके बच्चों की संख्या संख्या तेजी तेजी से से है है।

परिणामस्वरूप श्रम की पूर्ति बढ़ती है। s पूर्ति बढ़ने से स्वाभाविक रूप से मजदूरी दर गिरेगी गिरेगी अन्त में में s s s s 10 पर ही सन्तुलन की स्थिति निश्चित होगी। मजदूरी दर روبية. 10 से यदि नीचे गिरी तो कोई मजदूर पर आने के लिए नहीं नहीं होगा क्योंकि से से कम कम कम कम जीवन जीवन से अवश्य अवश्य पूरी चाहिए।।।

हम यदि यह मान भी लें कि की बहुत बहुत बढ़ने बढ़ने मजदूरी दर निर्वाह निर्वाह लागत लागत भी भी नीचे नीचे उस उस उस उस उस दशा उस दशा उस दशा दशा दशा दशा में में दशा दशा में में में उस मिलने मिलने मिलने मिलने मिलने मिलने।।।।।।।

मृत्यु-दर बढ़ जाने से श्रमिकों की कम हो जायेगी जायेगी अन्त में मजदूरी मजदूरी जीवन जीवन निर्वाह निर्वाह स्तर स्तर स्तर के समान जायेगी जायेगी।। अतः यह कहना ठीक होगा कि दीर्घकाल मजदूरी उस रकम के बराबर होगी जो एक एक तथा परिवार परिवार परिवार परिवार जीवित जीवित रखने रखने के हो।।

आलोचना ( النقد):

इस सिद्धान्त के प्रमुख दोष निम्न प्रकार हैं:

أ. One पक्षीय (جانب واحد):

यह सिद्धान्त श्रम की माँग पक्ष की अपेक्षा है और और केवल पक्ष पूर्ति पूर्ति पर ही है।। इस सिद्धान्त में श्रम की आवश्यकता को ध्यान में नहीं रखा गया है क्योंकि क्योंकि उत्पादकता माँग को निर्धारित निर्धारित करती है।।

ب. Dif में भिन्नता (الفرق في الأجور):

यदि सभी श्रमिकों को जीवन निर्वाह के बराबर दी जाये जाये तो मजदूरी समान समान होनी जबकि जबकि वास्तविक वास्तविक में में मजदूरी मजदूरी दर भिन्नता भिन्नता पायी है।।।

ج. Neg संघ की उपेक्षा (إهمال النقابات):

इस सिद्धान्त में श्रम संघों की उपेक्षा गयी है और यह माना गया है कि कि संघ किसी किसी किसी किसी प्रकार प्रकार मजदूरी मजदूरी को करते।। वास्तविक जीवन में श्रम संघ मजदूरी को प्रभावित करते हैं।

د. सिद्धान्त सिद्धान्त (نظرية الفترة الطويلة):

इस सिद्धान्त में यह पता नहीं लगता कि में मजदूरी मजदूरी दर किस प्रकार निर्धारित होती है। वास्तविक जीवन में दीर्घकाल वह अवधि है जिसमें हम सब मर जाते हैं।

ه. सिद्धान्त सिद्धान्त (نظرية الغموض):

जीवन-निर्वाह सिद्धान्त एक अस्पष्ट सिद्धान्त है। इस सिद्धान्त के अनुसार मजदूरी में वृद्धि की आशा नहीं की जा सकती। अतः यह एक निराशावादी सिद्धान्त है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि सिद्धान्त का का के साथ षड्‌यन्त्र है मजदूरी दर दर बात करते करते करते समय से विवाह विवाह विवाह विवाह विवाह विवाह विवाह विवाह विवाह विवाह विवाह विवाह विवाह विवाह विवाह विवाह विवाह विवाह बीच बीच बीच बीच बीच बीच बीच बीच बीच।।। ऐसा लगता है जैसे श्रमिकों को विवाह से वंचित करना चाहते हैं।


مقال # 3. Standard का जीवन-स्तर सिद्धान्त ( مستوى المعيشة نظرية الأجور):

15 सिद्धान्त का प्रतिपादन सन् 1815 में प्रो. Tor (Torrens) ने किया था। जीवन स्तर स्तर सिद्धान्त अनुसार एक श्रमिक को इतनी मिलनी मिलनी चाहिए वह उन सब व व सेवाओं सेवाओं खरीद खरीद सके सके सके उपभोग उपभोग का का का का का का का का वह का वह आदी।।। उनके अनुसार श्रमिक को वे सब वस्तुएँ सेवाएँ उसकी मजदूरी मजदूरी अवश्य प्राप्त हो जानी जानी जिनकी जिनकी उसे उसे उसे उसे उसे पड़ पड़।।।

इसका अर्थ यह है कि श्रमिक को अनिवार्य आराम तथा विलासिता सम्बन्धी जितनी वस्तुओं एवं सेवाओं उपभोग की की पड़ पड़ गयी गयी गयी उसकी मजदूरी मजदूरी मजदूरी मजदूरी मजदूरी मजदूरी मजदूरी मजदूरी से से से से।।। कोई भी व्यक्ति जितनी मात्रा अनिवार्य अनिवार्य आराम एवं विलासिताओं का उपभोग है उसका जीवन जीवन भी भी इन्हीं इन्हीं की मात्रा मात्रा के के निर्धारित निर्धारित है।।

चाहिए सिद्धान्त इस मान्यता पर आधारित है कि को मजदूरी केवल जीवन निर्वाह स्तर बनाए रखने के लिए लिए नहीं दी जानी चाहिए चाहिए चाहिए चाहिए चाहिए चाहिए चाहिए चाहिए चाहिए चाहिए चाहिए चाहिए चाहिए जानी दर दर दर दर दर दर कम कम कि कि कि कि कि कि को को को को को को . अनिवार्य-स्तर सिद्धान्त के अनुसार मजदूरी की दर में अनिवार्य आरामदायक और और विलासिता सभी को सम्मिलित किया चाहिए चाहिए।

जीवन-स्तर सिद्धान्त में श्रमिक की कार्यक्षमता को भी ध्यान में रखा जाता है।। जीवन-स्तर जितना ही ऊँचा होगा श्रमिक की कार्यक्षमता कार्यक्षमता भी उतनी ही अधिक होगी।

आलोचना ( النقد):

أنا. सिद्धान्त सिद्धान्त ( نظرية الغموض):

जीवन-स्तर की धारणा बड़ी अस्पष्ट धारणा और इसका कोई कोई निश्चित मापदण्ड भी नहीं है। टी सकता है कि कुछ श्रमिक अन्य साधनों से पर्याप्त आय होने पर टी. वी. जैसी विलासिता का भी उपभोग करने लगें उनके जीवन स्तर स्तर के निर्धारण में इस आवश्यकता आवश्यकता भी भी ध्यान ध्यान ध्यान ध्यान रखा।।।

ثانيا. सिद्धान्त सिद्धान्त (نظرية من جانب واحد):

है का यह सिद्धान्त जीवन निर्वाह सिद्धान्त की भाँति एकपक्षीय है जिसमें केवल पूर्ति पूर्ति पक्ष को किया किया किया है और और माँग माँग उपेक्षा उपेक्षा उपेक्षा है।।।

ثالثا. दीर्घकाल (طويل الأجل):

इस सिद्धान्त से यह पता नहीं लगता मजदूरी अल्पकाल में किस प्रकार निर्धारित होती है है यह यह सिद्धान्त सिद्धान्त सिद्धान्त दीर्घकालीन सिद्धान्त है।। दीर्घकाल वह समयावधि होती है जो वास्तविक नहीं क्योंकि दीर्घकाल दीर्घकाल में हम सब मर जाते हैं।

د. Dif की दरों में अन्तर (الفرق في معدلات الأجور):

एक ही स्थान पर मजदूरी की दरों अन्तर पाया जाता है जबकि प्रायः श्रमिकों के के रहन का का का का का एक एक जैसा है है। इसका अर्थ यह है कि यह सिद्धान्त मजूदरी दरों में में अन्तर को स्पष्ट नहीं करता।

v. सिद्धान्त सिद्धान्त (نظرية غير محددة):

इस सिद्धान्त में यह पता नहीं लगता मजदूरी जीवन स्तर स्तर को करती करती है अथवा जीवन स्तर मजदूरी मजदूरी मजदूरी मजदूरी को को करता है।। यह सिद्धान्त इसी कारण एक अनिश्चित सिद्धान्त कहा जा सकता है।

अन्त में यह कहा जा सकता है इस सिद्धान्त में में जीवन निर्वाह निर्वाह सिद्धान्त में मौलिक रूप रूप से से से से कोई अन्तर अन्तर है।


مقال # 4. सिद्धान्त अधिकारी सिद्धान्त ( نظرية المطالب المتبقية):

इस सिद्धान्त के प्रतिपादन का श्रेय. J स्मिथ को जाता है परन्तु इसे विकसित करने का श्रेय श्रेय जेवन्स J (Jevons) तथा वाकर (Walker) को जाता है। इन दोनों अर्थशास्त्रियों ने ही इस सिद्धान्त को ठीक ढंग से प्रस्तुत किया।

है उद्योग के कुछ उत्पादन मूल्य में से के अलावा अन्य उत्पादन साधनों को भुगतान के बाद जो कुछ कुछ शेष शेष रहता रहता रहता श्रमिकों श्रमिकों श्रमिकों श्रमिकों श्रमिकों श्रमिकों श्रमिकों श्रमिकों श्रमिकों श्रमिकों श्रमिकों श्रमिकों को को को प्राप्त प्राप्त प्राप्त प्राप्त प्राप्त प्राप्त श्रमिकों प्राप्त है है है है है है है

मजदूरी = कुल आगम - लगान - ब्याज - लाभ

الأجور = إجمالي الإيرادات - الإيجار - الفائدة - الربح

अथवा ، मजदूरी = कुल आगम - (लगान + ब्याज + लाभ)

यहाँ हम यह मानकर चल रहे हैं उद्यम की सेवाओं के बदले पुरस्कार पुरस्कार प्राप्त है वह वह साधनों साधनों की की की भाँति है है है जो है जो जो जो जो जो जो जो जो जो जो जो जो जो जो।। लगान ، ब्याज ، लाभ ये तीनों ही पुरस्कार क्रमशः भू स्वामी स्वामी ، पूँजीपति और उद्यमी को दिये जाते जाते हैं स्वतन्त्र रूप रूप से हैं।।

लगान तक मजदूरी का प्रश्न है यह गणना के लिए लिए कुल उत्पादन मूल्य में से लगान लगान ब्याज ब्याज और लाभ लाभ इन तीनों को घटा दिया।।। बची हुई राशि ही मजदूरी है।

"श्रमिक को मजदूरी अन्त में उसके उत्पादन उस भाग के बराबर दी जाती है जो लगान लगान कर तथा तथा पूँजी पर ब्याज के।" -।

इस सिद्धान्त की प्रमुख विशेषता यह है कि सिद्धान्त श्रमिकों श्रमिकों की कार्यक्षमता पर विशेष ध्यान देता है। कार्यक्षमता के बढ़ने से उत्पादन बढ़ता है और बढ़ने से से श्रमिकों की मजदूरी भी बढ़ती है। इस प्रकार यह सिद्धान्त यह मान्यता प्रकट करता है श्रमिक श्रमिक अपनी बढ़ाकर अपनी अपनी मजदूरी भी बढ़ा सकते हैं।।

आलोचना ( النقد):

कोई भी सिद्धान्त दोषरहित नहीं होता।

हैं ने इस सिद्धान्त के भी निम्न प्रमुख दोष बताये हैं:

(1) सिद्धान्त ( نظرية المتبقية):

इस सिद्धान्त के अनुसार श्रमिक अवशेष का अधिकारी होता जबकि जबकि अवशेष अनुसार पारितोषक पारितोषक ऋणात्मक भी हो सकता है।। हम यह जानते हैं कि मजदूरी कभी ऋणात्मक नहीं हो सकती है। अतः यह सिद्धान्त दोषपूर्ण है।

(2) I संघों की उपेक्षा (يتجاهل النقابات):

इस सिद्धान्त में भी मजदूरी निर्धारण में संघों के महत्व को छोड़ गया गया है है श्रम संघ संघ संघ जीवन में में इस इस इस महत्वपूर्ण महत्वपूर्ण महत्वपूर्ण हैं।।।

(3) Dif में भिन्नता (الفرق في الأجور):

यह सिद्धान्त इस बात को स्पष्ट नहीं करता मजदूरी दरों दरों में अन्तर क्यों पाया जाता है। वास्तव में इसे सिद्धान्त कहना ही सबसे बड़ा है क्योंकि क्योंकि यह कोई सिद्धान्त नहीं है।


مقالة # 5. सिद्धान्त का सीमान्त उत्पादकता का सिद्धान्त ( نظرية الإنتاجية الحدية للأجور):

इस सिद्धान्त के प्रतिपादक जे. बी. J (JB Clark) थे। इस सिद्धान्त के अनुसार उत्पादकों द्वारा मजदूरों की उनकी सीमान्त सीमान्त उत्पादकता पर निर्भर करती है। श्रमिकों को उनकी सीमान्त उत्पादकता के मूल्य के बराबर मजदूरी दी जाती है। यह सिद्धान्त स्पष्ट करता है कि मजदूरी श्रमिक की उत्पादकता उत्पादकता के के बराबर बराबर होने की प्रवृत्ति रखती है।।

श्रम की माँग व्युत्पन्न माँग (Derived Demand) होती है क्योंकि श्रम की माँग श्रम द्वारा उत्पादित वस्तु की माँग पर निर्भर करती है । अन्य उत्पत्ति के साधनों को स्थिर रखते हुए जब उद्योगपति श्रम की अतिरिक्त इकाइयों का प्रयोग करता जाता है तब उत्पत्ति ह्रास नियम की क्रियाशीलता के कारण श्रम की सीमान्त उत्पादकता घटती जाती है ।

एक उद्यमी उस बिन्दु तक श्रम की इकाइयों का प्रयोग करेगा जहाँ पर श्रम की सीमान्त उत्पादकता का मूल्य श्रमिक को दी जाने वाली मजदूरी के बराबर हो जाता है ।

यह सिद्धान्त कुछ मान्यताओं पर आधारित है:

أنا. श्रम बाजार में पूर्ण प्रतियोगिता है ।

ثانيا. श्रमिकों में एकसमान कार्यक्षमता पायी जाती है ।

ثالثا. श्रमिकों में पूर्ण गतिशीलता पायी जाती है ।

د. उत्पादन में उत्पत्ति ह्रास नियम लागू होता है ।

v. अर्थव्यवस्था में पूर्ण रोजगार विद्यमान रहता है ।

आलोचना ( النقد):

(1) यह सिद्धान्त एकपक्षीय है क्योंकि यह श्रमिकों के माँग पक्ष की व्याख्या करता है और पूर्ति पक्ष के सम्बन्ध में कुछ नहीं बताता है ।

(2) यह सिद्धान्त पूर्ण प्रतियोगिता की अवास्तविक मान्यताओं पर आधारित है ।

(3) यह सिद्धान्त सभी श्रमिकों की कार्यक्षमता को एकसमान मान लेता है जो वास्तविक जीवन में गलत है ।

(4) श्रमिकों में पूर्ण गतिशीलता की मान्यता अव्यावहारिक है क्योंकि वास्तविक जीवन में श्रमिक के एक उत्पादन क्षेत्र से दूसरे उत्पादन क्षेत्र में गतिशील होने में अनेक रुकावटें उत्पन्न होती हैं ।


Essay # 6. मजदूरी का आधुनिक सिद्धान्त ( Modern Theory of Wages):

वस्तु की कीमत की भाँति श्रम कीमत अर्थात् मजदूरी भी श्रम की माँग और श्रम की पूर्ति द्वारा निर्धारित होती है । श्रम की माँग व्यूत्पन्न माँग होती है । अतः मजदूरी निर्धारण करने के लिए एक अलग सिद्धान्त की आवश्यकता पड़ती है । पूर्ण प्रतियोगी बाजार में एक उद्योग के अन्तर्गत मजदूरी उस बिन्दु पर निर्धारित होती है जहाँ श्रमिकों की पूर्ति रेखा श्रमिकों की माँग रेखा को काटती है ।

श्रम की पूर्ति ( Supply of Labour):

श्रम की पूर्ति से अभिप्राय उन श्रम घण्टों से लिया जाता है जो एक श्रमिक विभिन्न मजदूरी देने पर कार्य करने के लिए प्रस्तुत करता है । श्रम कार्य घण्टों एवं मजदूरी दर में सामान्यतः एक प्रत्यक्ष सम्बन्ध पाया जाता है । ऊँची मजदूरी दर पर अधिक श्रमिक कार्य करने के लिए उपलब्ध होंगे तथा कम मजदूरी दर पर श्रमिकों की कम संख्या कार्य के लिए उपलब्ध होगी ।

इस प्रकार एक बृहत् दृष्टिकोण के अन्तर्गत कहा जा सकता है कि श्रम का पूर्ति वक्र बायें से दायें ऊपर बढ़ता हुआ होता है । एक उद्योग को इसी प्रकार के पूर्ति वक्र का सामना करना पड़ता है जिसके अन्तर्गत ऊँची मजदूरी देकर ही अधिक श्रम को आकर्षित किया जा सकता है ।

श्रम की पूर्ति एक व्यक्तिगत फर्म के लिए पूर्णतः लोचदार होती है, अर्थात् एक दी हुई मजदूरी दर एक फर्म के लिए पूर्ण प्रतियोगिता की दशा में श्रम का पूर्ति वक्र एक पड़ी रेखा के रूप में होता है किन्तु पूर्ण प्रतियोगिता की दशा में श्रमिकों का पूर्ति वक्र उद्योग के सन्दर्भ में पूर्णतः लोचदार नहीं होता ।

उद्योग के श्रम पूर्ति वक्र की लोच निम्नलिखित बातों पर निर्भर करती है:

1. व्यवसाय गतिशीलता ( Occupational Mobility):

यदि श्रमिकों के मध्य व्यवसाय गतिशीलता अधिक होगी तो उद्योग विशेष का श्रम पूर्ति वक्र अधिक लोचदार हो जायेगा क्योंकि एक मजदूरी दर दूसरे उद्योगों के श्रमिकों को इस उद्योग विशेष में आने के लिए प्रोत्साहित करेगी ।

व्यवसाय गतिशीलता निम्नलिखित बातों पर निर्भर करती है:

(a) श्रम की प्रकृति (Nature of Labour):

शिक्षित अथवा अशिक्षित । अशिक्षित श्रमिकों के लिए उद्योगों के मध्य गतिशीलता अधिक होती है, जबकि शिक्षित श्रम अधिक गतिशील नहीं हो पाता ।

(b) व्यवसाय परिवर्तन में होने वाली स्थानान्तरण लागत (Transfer Cost) ऊँची स्थानान्तरण लागत गतिशीलता को रोकती है ।

(c) अन्य उद्योगों में मजदूरी दर:

यदि अन्य उद्योगों में उद्योग विशेष की अपेक्षा ऊँची मजदूरी दर और व्यवसाय सुरक्षा है तो श्रमिक उद्योग विशेष को छोड़कर अन्यत्र जाने लगेंगे और श्रमिकों की पूर्ति कम हो जायेगी ।

2. कार्य-आराम अनुपात (Work-Leisure Ratio):

श्रम की पूर्ति को प्रभावित करने वाला यह एक महत्वपूर्ण तत्व है । जैसे-जैसे मजदूरी दर में परिवर्तन होता जाता है वैसे-वैसे एक श्रमिक के लिए कार्य-आराम अनुपात परिवर्तित होता जाता है ।

मजदूरी में परिवर्तन के कारण दो प्रकार के प्रभाव उत्पन्न होते हैं:

(a) प्रतिस्थापन प्रभाव (Substitution Effect)

(b) आय प्रभाव (Income Effect) |

जब मजदूरी दर में वृद्धि होती है तो यह वृद्धि श्रमिकों को अधिक कार्य करने के लिए प्रेरित करती है जिसके कारण वे श्रमिक अपने आराम के घण्टों का अपने कार्य के घण्टों से प्रतिस्थापन करने लगते हैं । इसी प्रक्रिया को मजदूरी में वृद्धि के कारण उत्पन्न होने वाला प्रतिस्थापन प्रभाव कहा जाता है ।

प्रतिस्थापन प्रभाव सदैव धनात्मक होता है (Substitution Effect is Always Positive) | दूसरे शब्दों में, कहा जा सकता है कि धनात्मक प्रतिस्थापन प्रभाव में मजदूरी में वृद्धि होने पर अधिक से अधिक काम करने के लिए उस उद्योग में उपस्थित होंगे ।

दूसरी ओर यह श्रमिक की मनोवैज्ञानिक प्रकृति है कि आय का स्तर बढ़ जाने पर श्रमिक अधिक आराम पसन्द हो जाता है । जब मजदूरी दर में वृद्धि होती है तो अतिरिक्त आय मिल जाने के कारण श्रमिक अपने कार्य-आराम के घण्टों की संख्या को बढ़ा देता है ।

यह मजदूरी में वृद्धि के कारण उत्पन्न आय प्रभाव (Income Effect) है जो ऋणात्मक (Negative) होता है जिसके अनुसार मजदूरी की वृद्धि श्रमिक को अधिक आराम करने के लिए प्रोत्साहित करती है न कि अधिक काम करने के लिए । इस प्रकार ऊँची मजदूरी पर श्रम पूर्ति संकुचित होने की प्रवृत्ति रखती है ।

मजदूरी में वृद्धि के कारण उत्पन्न प्रतिस्थापन प्रभाव एवं आय प्रभाव के कारण श्रम की वास्तविक पूर्ति (Net Supply) दोनों प्रभावों के परिणाम पर निर्भर करती है । श्रम की इस वास्तविक पूर्ति पर मजदूरी के परिवर्तन का सही अनुमान लगाना एक कठिन कार्य है ।

अर्थशास्त्रियों ने यह स्पष्ट किया है कि कम मजदूरी स्तर पर धनात्मक प्रतिस्थापन प्रभाव, ऋणात्मक आय प्रभाव की तुलना में अधिक बलशाली होता है जिसके कारण मजदूरी में वृद्धि होने पर अधिक श्रम पूर्ति उपलब्ध होती है ।

इसके अनुसार श्रम का पूर्ति वक्र बायें से दायें ऊपर बढ़ता हुआ होता है किन्तु मजदूरी में एक पर्याप्त स्तर तक वृद्धि हो जाने पर एक सीमा के बाद यह सम्भव है कि ऋणात्मक आय प्रभाव धनात्मक प्रतिस्थापन प्रभाव से अधिक बलशाली हो जाए ।

दूसरे शब्दों में, मजदूरी दर में वृद्धि के कारण श्रमिकों की वास्तविक पूर्ति में कमी हो जायेगी । ऐसी स्थिति में श्रम का पूर्ति वक्र उस पर्याप्त मजदूरी दर के बाद पीछे की ओर झुका हुआ (Backward Sloping) हो जाता है जैसा कि चित्र 1 में दिखाया गया है ।

इस चित्र में श्रम का पूर्ति वक्र OW 2 मजदूरी स्तर तक बायें से दायें ऊपर बढ़ता हुआ है क्योंकि इस मजदूरी स्तर तक धनात्मक प्रतिस्थापन प्रभाव, ऋणात्मक आय प्रभाव से अधिक है किन्तु इस मजदूरी स्तर के बाद जब मजदूरी बढ़कर OW 3 हो जाती है तब आय प्रभाव, प्रतिस्थापन प्रभाव से बलशाली हो जाता है जिसके कारण श्रमिक की पूर्ति ON 2 से घटकर ON 3 हो जाती है ।

श्रम की माँग ( Demand of Labour):

श्रम की माँग उद्यमियों द्वारा किसी वस्तु के उत्पादन के लिए की जाती है । जैसा कि हम पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि श्रम की माँग अप्रत्यक्ष अथवा व्युत्पन्न माँग (Derived Demand) होती है क्योंकि श्रम की माँग उस वस्तु की माँग पर निर्भर करती है जिसके उत्पादन में उस श्रम का प्रयोग किया जाता है ।

उद्यमी किस बिन्दु तक श्रमिकों की माँग करेगा यह इस बात पर निर्भर करेगा कि उस श्रम की क्या उत्पादकता है । श्रम की सीमान्त उत्पादकता के बराबर श्रमिकों को मजदूरी दी जाती है ।

उत्पत्ति ह्रास नियम के कारण जब श्रम की अधिक इकाइयों का प्रयोग हम करते चले जाते हैं तो अतिरिक्त श्रम की इकाइयों की सीमान्त उत्पादकता घटती चली जाती है । उद्यमी अपने उद्योग में श्रमिकों का प्रयोग उस सीमा तक करता है जहाँ पर श्रम की सीमान्त उत्पादकता का मूल्य उसको दी जाने वाली मजदूरी के बराबर होगा ।

किसी उद्योग के MRP वक्र का घटता हुआ भाग ही उस उद्योग-विशेष के श्रम के माँग वक्र को बताता है । चित्र 2 में श्रम का वक्र D L D L प्रदर्शित किया गया है जो बायें से दायें नीचे गिरता है । यह श्रम का माँग वक्र मजदूरी दर और श्रम की माँग मात्रा के विपरीत सम्बन्ध को बताता है अर्थात् कम मजदूरी दर पर अधिक श्रमिकों की माँग होती है ।

श्रम की माँग कुछ मुख्य बातों पर निर्भर करती है जो निम्नलिखित हैं:

(1) श्रम की माँग श्रम की उत्पादकता पर निर्भर करती है ।

(2) श्रम की माँग व्युत्पन्न माँग होने के कारण उत्पादित वस्तु की माँग पर निर्भर करती है ।

(3) श्रम की माँग उद्योग के द्वारा अपनायी गयी उत्पादन की तकनीक एवं तकनीकी दशाओं पर भी निर्भर करती है । यदि फर्म पूँजी गहन रीति (Capital-intensive Technique) का प्रयोग करती है तो ऐसे उद्योग में श्रम की कम माँग होगी । इसके विपरीत, यदि फर्म श्रम गहन रीति (Labour-intensive Technique) का प्रयोग करती है तो ऐसे उद्योग में श्रम की माँग अपेक्षाकृत अधिक होगी ।

(4) श्रम की माँग पूँजीगत साधनों की कीमतों पर भी निर्भर करती है क्योंकि श्रम और पूँजी में स्थानापन्नता का अंश (Degree of Substitutability) उपस्थित होता है । यदि पूँजीगत साधनों की कीमत में वृद्धि होती है तो श्रम की माँग में वृद्धि होगी । इसके विपरीत, यदि पूँजीगत साधन सस्ते होते हैं तो इन साधनों द्वारा श्रमिक का प्रतिस्थापन होगा और श्रम की माँग कम हो जायेगी ।

मजदूरी निर्धारण-माँग-पूर्ति सन्तुलन ( Wage Determination-Demand-Supply Equilibrium):

एक उद्योग में मजदूरी का निर्धारण उस बिन्दु पर होता है जहाँ श्रम की माँग एवं श्रम की पूर्ति परस्पर बराबर होते हैं । चित्र 3 में इस सन्तुलन स्थिति को बिन्दु 'E' पर दिखाया गया है ।

सन्तुलन बिन्दु 'E' पर,

श्रम की माँग = EN

श्रम की पूर्ति = EN

तथा, मजदूरी दर = OW

पूर्ण प्रतियोगिता में मजदूरी निर्धारण एक स्वतः प्रक्रिया है । यदि OW 1 मजदूरी दर है तो aW 1 श्रम की माँग तथा bW 1 श्रम की पूर्ति है । दूसरे शब्दों में, OW 1 मजदूरी दर पर ab अतिरेक श्रम पूर्ति (Excess Supply of Labour) उपस्थित होती है ।

यह अतिरिक्त पूर्ति अथवा बेरोजगारी श्रमिकों के मध्य स्पर्द्धा उत्पन्न करेगी जिसके कारण मजदूरी दर में कमी होनी आरम्भ होगी । मजदूरी में कमी की यह प्रक्रिया तब तक जारी रहेगी जब तक श्रम की माँग तथा श्रम की पूर्ति पुनः बिन्दु 'E' पर बराबर न हो जायें ।

इसके विपरीत, यदि किसी कारणवश श्रम की मजदूरी दर OW 2 हो जाती है तो इस दशा में cW 2 श्रम की पूर्ति और dW 2 श्रम की माँग प्राप्त होती है अर्थात् OW 2 मजदूरी दर पर cd अतिरेक श्रम माँग (Excess Demand of Labour) प्राप्त होती है । श्रमिकों की यह अतिरिक्त माँग मजदूरी दर को तब तक बढ़ायेगी जब तक पुनः बिन्दु 'E' पर माँग और पूर्ति सन्तुलन में न आ जायें ।

संक्षेप में, कहा जा सकता है कि पूर्ण प्रतियोगिता के अन्तर्गत मजदूरी दर उस बिन्दु पर निर्धारित होती है जहाँ श्रमिक की माँग श्रमिक की पूर्ति के बराबर हो जाये ।


 

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