نظرية المصالح الكلاسيكية الجديدة | الهندية | قرض | اقتصاديات

اقرأ هذا المقال باللغة الهندية للتعرف على النظرية الكلاسيكية الجديدة في الاهتمام.

इस सिद्धान्त को उधार देय कोष सिद्धान्त भी कहा जाता है। W योग्य कोष सिद्धान्त के प्रतिपादन का विकसेल विकसेल विकसेल W (Wicksell)، Oh (Ohlin) तथा मिर्डल (Myrdal) को जाता है। इस सिद्धान्त का समर्थन अंग्रेज अर्थशास्त्री. Rober (روبرتسون) ने किया है।

तत्वों सिद्धान्त में ब्याज दर निर्धारित तत्वों तत्वों तत्वों (जैसे - उत्पादकता، प्रतीक्षा، बचत आदि) के अलावा म्रौद्रिक तत्वों (जैसे - मुद्रा का संचय، असंचय، बैंक साख को) को शामिल आदि।। इस प्रकार ऋण योग्य कोष सिद्धान्त प्रतिष्ठित सिद्धान्त के ऊपर एक सुधार है।

ऋण योग्य कोष की माँग व पूर्ति की शक्तियों द्वारा द्वारा ही दर का का निर्धारण किया है।। दूसरे शब्दों में ، ब्याज दर वह कीमत है ऋण योग्य योग्य की माँग व व पूर्ति सन्तुलित सन्तुलित करती है।।

Supply योग्य कोष की पूर्ति ( توفير الأموال القابلة للقرض):

हैं योग्य कोष की पूर्ति के चार स्रोत बताये गये हैं:

1. Saving (الادخار):

आय और उपभोग व्यय का अन्तर बचत है अर्थात् उपभोग करने के बाद जो आय आय जाती जाती है है है वही बचत है।। बचतें व्यक्तिगत क्षेत्र ، व्यावसायिक क्षेत्र तथा सरकारी क्षेत्र तीनों द्वारा की जाती है।

व्यावसायिक बचतें ब्याज की दर से प्रभावित होती हैं। ब्याज की वृद्धि बचतों को भी बढ़ायेगी तथा ब्याज की कमी बचतों को भी घटायेगी।। इस प्रकार बचत पूर्ति एवं ब्याज की दर का सीधा सम्बन्ध होता है।

2. साख (الائتمان المصرفي):

ऋण योग्य कोष की पूर्ति का दूसरा प्रमुख साधन बैंक साख है। व्यापारिक बैंक साख का निर्माण कर सकते हैं। ब्याज की एक न्यूनतम दर के बाद बैंक साख ब्याज सापेक्ष होती है। यह भी स्वाभाविक है कि ब्याज की दर पर बैंक अधिक रुपया उधार देंगे और और की नीची नीची नीची नीची पर पर बैंक बैंक कम देंगे।। इस प्रकार ब्याज दर और बैंक साख का भी सीधा सम्बन्ध है।

3. D ( Dishoarding):

मुद्रा का एक और प्रमुख कार्य है - संचय। संचय से अभिप्राय सम्पत्ति के उस भाग से जिसे लोग लोग मुद्रा के रूप में रखना चाहते हैं। यदि ब्याज दर अधिक होती है तो की हुई राशि असंचित कर जाती जाती है है यदि ब्याज ब्याज ब्याज कम हो हो हो तो की मात्रा मात्रा होगी।।। इस प्रकार असंचय की गई राशि का ब्याज दर से से प्रत्यक्ष एवं सीधा सम्बन्ध है।

4. अनिवेश (عدم الاستثمار):

अनिवेश का यह अर्थ नहीं कि उद्योगपति कारखाना बन्द दें परन्तु हाँ यदि में किसी किसी नयी तकनीक के के के मशीन पुरानी पुरानी पुरानी पुरानी पुरानी पुरानी पुरानी पुरानी पुरानी पुरानी पुरानी पुरानी पुरानी पुरानी पुरानी पुरानी पुरानी पुरानी पुरानी पुरानी पुरानी पुरानी पुरानी पुरानी हो हो न न के के अनुकूल के के के अनुकूल के अनुकूल अनुकूल कारखाने को बेचकर उधार ली गयी पूँजी का भुगतान कर देता है।

इस स्थिति को अनिवेश कहा जा सकता है। जिस समय बाजार में ब्याज की दर होती है तो अनिवेश अधिक होता है और और दर कम कम कम कम कम तो तो अनिवेश अनिवेश होगा।।

है योग्य कोष की पूर्ति में सम्मिलित घटकों को निम्नांकित रूप में व्यक्त किया किया जा सकता है:

SL = S + M + DH + DI

SL ، SL = توفير الأموال القابلة للإقراض (ऋण योग्य कोष की पूर्ति)

S = التوفير (बचत)

M = الائتمان المصرفي (बैंक साख)

DH = Dishoarding (असंचय)

DI = عدم الاستثمار (अनिवेश)

Dem योग्य कोष की माँग ( الطلب على الأموال القابلة للقرض):

है योग्य कोष की माँग प्रमुख रूप से तीन कारणों से की जाती है:

1. निवेश (الاستثمار):

ऋण योग्य कोषों की माँग प्रमुख रूप से विनियोग के लिए की जाती है।। पूँजी की माँग उद्यमी द्वारा इसलिए की है पूँजी पूँजी उत्पादक होती और उद्यमी उद्यमी अपेक्षा करता करता कि कि वह वह वह पूँजी विनियोग विनियोग विनियोग कर कर कर कर कर कर कर कर कर कर कर कर कर कर कर।।।

इसी प्रतिफल से वह उधार ली गयी पूँजी ब्याज का का भी भुगतान कर देता है। ब्याज की दर कम होने पर ऋण कोषों की विनियोग के लिए माँग होगी होगी ब्याज दर दर दर होने पर पर पर ऋण ऋण की की की की विनियोग विनियोग विनियोग विनियोग विनियोग विनियोग विनियोग विनियोग विनियोग विनियोग लिए।।।

2 . उपभोग (الاستهلاك):

कुछ लोग स्वभाव से फिजूलखर्ची होते हैं वह अपनी आय से अधिक भाग उपभोग पर पर करते हैं हैं हैं हैं कारण कारण उन्हें उन्हें ऋण है।। कुछ लोग अधिक खर्च करने के लिए विवश हैं क्योंकि क्योंकि आय बहुत कम होती है। कुछ परिस्थितियों में ऋण लेना है है، जैसे - सामाजिक संस्कारों को मनाने में बहुत पैसा खर्च हो जाता है। ब्याज दर कम होने पर उपभोग ऋण अधिक लिये जाते हैं।

3. संचय (اكتناز):

संचय के लिए भी ऋण योग्य कोषों की माँग की जाती है। व्यक्ति अनेक कारणों से संचय करना चाहता है। ब्याज दर कम होने पर संचय माँग अधिक होगी।

DL योग्य कोषों की कुल माँग ( DL) = I + C + H

DL ، DL = الطلب على الأموال القابلة للقرض

أنا = الاستثمار (निवेश)

ج = الاستهلاك (उपभोग)

ح = اكتناز (संचय)

Det दर निर्धारण ( تحديد الفائدة):

साम्य की स्थिति में ،

SL = DL

ऋण योग्य कोष की पूर्ति = ऋण योग्य कोष की माँग

S + M + DH + DI = I + C + H

S + M = (I - DI) + (H - DH) + C

बचत + बैंक मुद्रा = निबल विनियोग + निबल संचय + उपभोग

(S - C) + M = (I - DI) + (H - DH)

صافي التوفير + الائتمان المصرفي = صافي الاستثمار + صافي اكتناز

Dem विश्लेषण में ऋण कोष वक्र वक्र (منحنى الطلب للصناديق القابلة للإقراض) तथा ऋण योग्य कोष पूर्ति वक्र (منحنى العرض للصناديق القابلة للقرض) प्राप्त होते हैं जो चित्र 4 में चित्र दर का निर्धारण बिन्दु E पर करते पर पर पर पर पर बराबर बराबर बराबर निर्धारित करते हैं।

Cr योग्य राशियों के सिद्धान्त की आलोचना ( نقد نظرية الصندوق القابل للقرض):

हैं कीन्स तथा अन्य अर्थशास्त्रियों ने इस सिद्धान्त में निम्न दोष बताये हैं:

(1) संचय की गलत धारणा (مفهوم خاطئ عن اكتناز):

प्रो. कीन्स का कहना है कि अर्थव्यवस्था में मुद्रा की कुल पूर्ति स्थिर होती है।। अतः यदि एक व्यक्ति मुद्रा का संचय अधिक है तो तो दूसरे व्यक्ति को यह कम करना होगा। इस प्रकार संचय की मात्रा में परिवर्तन नहीं हो सकता। संचय में व्यक्तिगत दृष्टिकोण से परिवर्तन हो सकता है परन्तु सामूहिक दृष्टि से नहीं।।

(2) पूर्ण रोजगार की अवास्तविक मान्यता (افتراض غير واقعي للعمالة الكاملة):

प्रो. कीन्स के अनुसार नव प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों द्वारा प्रतिपादित ऋण योग्य कोष सिद्धान्त पूर्ण पूर्ण रोजगार की की मान्यता मान्यता पर पर है है। यह सिद्धान्त भी उन्हीं अवास्तविक मान्यताओं पर आधारित जिन पर पर प्रतिष्ठित द्वारा दिया दिया गया सिद्धान्त है।।

(3) Mix एवं मौद्रिक तत्वों का मिश्रण (مزيج من العوامل الحقيقية والنقدية):

आलोचकों के अनुसार इस सिद्धान्त में ब्याज निर्धारण की दृष्टि से वास्तविक एवं मौद्रिक मौद्रिक तत्वों को शामिल किया किया गया है।। ये दोनों तत्व भिन्न-भिन्न हैं। अतः इनका विभिन्न चर-मूल्यों पर पड़ने वाले प्रभाव का भी अलग अलग अलग अध्ययन किया जाना चाहिए।

(4) सिद्धान्त (نظرية غير محددة):

ऋण योग्य कोष आय तथा विनियोग स्तर पर निर्भर हैं हैं और स्तर ब्याज ब्याज दर पर निर्भर करता है।। इस सिद्धान्त के अनुसार ऋण योग्य कोषों की पूर्ति माँग माँग की शक्तियाँ ब्याज ब्याज दर का निर्धारण करती हैं।। अतः यह सिद्धान्त एक ऐसे चक्र में फँसा है जिससे जिससे ब्याज दर का निर्धारण नहीं हो सकता।

में में، यह कहा जा सकता है यह सिद्धान्त भी आय पर के के की उपेक्षा करता और और और उन्हीं उन्हीं पर पर आधारित आधारित आधारित आधारित आधारित आधारित है है है है है है है है है है है है है है।।।।। परन्तु आधुनिक अर्थशास्त्री जिनमें प्रो. एच. जी. (HG Johnson) का नाम उल्लेखनीय है، इस सिद्धान्त को ब्याज दर निर्धारण निर्धारण एक गतिशील (Dynamic) सिद्धान्त मानते हैं।

 

ترك تعليقك